गुरुवार, 29 अक्टूबर 2026
इज़राइल के रिजल्ट में ख़ुश होने जैसी कोई चीज़ नहीं है।
इज़राइल के रिजल्ट में ख़ुश होने जैसी कोई चीज़ नहीं है।
यहूदियों का नब्बे फ़ीसद वोट ज़ायनिस्ट पार्टियों को गया है जिनकी विचारधारा में बस इतना ही फ़र्क़ है कि कोई हर फलस्तीनी को मार देना चाहता है तो कोई सिर्फ़ विस्थापित कर देना चाहता है।
सेंटर लेफ्ट यानी डेमोक्रेट्स को लगभग 9 फ़ीसद वोट मिले हैं, तो अरब-इज़रायली बराबरी की बात करने वाले लेफ्ट को 0.9%।
तो एक पूरी तरह हत्यारी मानसिकता से ग्रस्त देश में यह उम्मीद करना कि सत्ता में कोई ऐसा आ जाएगा जो क्षेत्र में शांति लाने की बात करेगा, नादानी ही है। अंदाज़ा लगाइए कि कोई अरब पार्टी का सहयोग लेने को तैयार नहीं है कि उसके वोटर बिदक जाएँगे। कुल फ़लस्तीनियों के तक़रीबन 10 फ़ीसद को इज़रायली नागरिकता मिली है, वोट देने का अधिकार मिला है, लेकिन वे भी बर्दाश्त नहीं हैं।
इस तरह फ़िलहाल नेतन्याहू कार्यवाहक प्रधानमंत्री हैं और कल ईरान के कई इलाक़ों में बमबारी हुई है। अमरीका और इजरायल इंतज़ार में हैं कि ईरान पलटवार करे तो जंग दुबारा शुरू हो जाएगी और ध्रुवीकरण के माहौल में आइजेनकोट का गठबंधन टूटे। ट्रम्प को अपना और अपने दामाद का ख़रबो डॉलर का निवेश बचाना है तो इज़रायल से लेकर पूरे अरब वर्ल्ड में उसे अपने लोग चाहिए, डेमोक्रेसी नहीं। नवंबर 4 का इंतज़ार कीजिए और नोट कीजिए कि इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया अपने नागरिकों को ज़रूरी सामान इकट्ठा करके रखने के लिए कह चुके हैं।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें